करेला के फायदे और नुकसान एवं औषधीय गुण

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करेला की दवाएं:-मधुमेह, रक्त शुद्धि, शुगर, मासिक धर्म, बवासीर, पथरी, गंठिया, स्तम्भन शक्ति, सिरदर्द, नेत्ररोग, कर्णशूल, मुंह के छाले, वमन, कंठ की सूजन, प्रसूता स्त्री दूध में वृद्धि, तिल्ली, जलोदर, पीलिया, शिशु उत्क्लेश, आंत के कीड़े, हैजा, सन्धिवात, वातरक्त रोग, चर्मरोग, दाह, सिर की फुंसियां, दाद, चेचक रोग, खसरा, शीतज्वर, बच्चों के रोग, बाल निमोनिया, सूजन, रतौंधी, मस्तक पीड़ा, त्वचा की सुंदरता, खुजली, फोड़ा-फुंसी, मोटापा, कब्ज आदि बिमारियों के इलाज में करेला के घरेलू दवाएं एवं औषधीय चिकित्सा प्रयोग निम्नलिखित प्रकार से किये जाते है:-करेला के फायदे और नुकसान एवं सेवन विधि

Table of Contents

करेला पौधे का औषधीय उपयोग किये जाने वाले भाग

करेला वृक्ष के प्रयोग करने योग भाग जड़, तना, फूल, फल, पत्ते, फल के जूस, फल का चूर्ण, जड़ का चूर्ण, पत्तों का रस, फल का बीज आदि घरेलू दवाएं में प्रयोग किया जाता है।

करेला पौधे में पाये जाने वाले पोषक तत्व

करेला में गंधयुक्त उड़नशील तेल केरोटीन, ग्लूकोसाइड, सेपोनिन एवं मामोरॉडिसाइन नाम क्षाराभ पाये जाते हैं। बीजों में 32 प्रतिशत विरेचक तेल पाया जाता हैं।

मधुमेह रोग में करेला रस के फायदे एवं सेवन विधि:

मधुमेह रोग में करेला उत्तम माना जाता हैं। करेला अग्न्याशय को उत्तेजित कर इन्सुलिन के स्राव को बढ़ता हैं। करेला फलों के छाया में सूखा कर महीन चूर्ण बना लें । इसे 5-6 ग्राम तक जल या मधु के साथ प्रयोग करने से मधुमेह में शीघ्र आराम मिलता है। करेला के ताजे फलों का रस 11-12 ग्राम तक पीते रहने से भी लाभ होता हैं। मधुमेह रोगी को करेला का शाक बनाकर खाने से भी मधुमेह रोगी को लाभ होता है।

रक्त शुद्धि में करेला के फायदे एवं सेवन विधि:

रक्त शुद्धि में करेला के ताजे फलों का रस 10-12 ग्राम तक नियमित प्रयोग करने से रक्त की शुद्धि होती है।

शुगर में करेला जूस के फायदे एवं सेवन विधि:

शुगर में करेले का जूस का अधिक से अधिक सेवन करने से शुगर को सीमित रखता है करेला हमारे शरीर में इंसुलिन के स्राव को बढ़ाता है। शुगर से परेशान मरीज को 15 मिलीलीटर करेले के जूस 110 मिलीलीटर पानी में मिलाकर नियमित सुबह-शाम तथा दोपहर करीब तीन महीने तक पिलाने से या खाने में भी करेले की सब्जी का प्रयोग करने से शुगर से पीड़िता शीघ्र ठीक हो जाता है।

मासिक धर्म में करेला रस के फायदे एवं सेवन विधि:

मासिक धर्म में करेला के पत्तों के 14-15 मिलीलीटर रस में सौंठ काली मिर्च और पीपल का चूर्ण बुरक कर दिन में दो तीन बार पिलाने से मासिक धर्म शुद्ध हो जाता है।

बवासीर में करेला के फायदे एवं सेवन विधि:

बवासीर (रक्तार्श/अर्श) में करेला के ऊपरी मोटे भाग का 55-100 मिलीलीटर काढ़ा बनाकर उसमें खंड मिलाकर सुबह-शाम नियमित प्रयोग करने से बवासीर में लाभ होता हैं। करेला की जड़ को घिसकर बाड़ी वाले अर्श के मस्सों पर लेप करने से लाभ मिलता हैं।

पथरी में करेला के हरे पत्तों के फायदे एवं सेवन विधि:

पथरी में करेले के हरे पत्तों का रस 35 ग्राम, दही 15 ग्राम, दोनों को मिलाकर पथरी रोगी को पीला दें, उसके बाद 75 ग्राम मठ्ठा पिला दें। तीन दिन पिलकर, फिर तीन दिन दवा बंद कर दें। फिर 4 दिन पिलाकर दवा बंद करें, इस प्रकार 5 दिन तक बढ़ाने से पथरी कट कर गिर जाती है। इसके प्रयोग के समय में केवल खिचड़ी और चावल ही खाना चाहिए।

गंठिया रोग में करेला के कच्चे हरे फलों के फायदे एवं सेवन विधि:

गठिया रोग में करेला के कच्चे हरे फलों के रस को गर्म करके लेप करने से गठिया रोग में लाभ होता हैं।

यौन शक्ति में करेला जूस के फायदे एवं सेवन विधि:

स्तम्भन शक्ति (शीघ्र पतन) में करेला के पत्ते और फलों के रस को आग में खुश्क कर 3-4 ग्राम की गोलियां बना लें, इसमें 1 गोली गाय का दूध के साथ पीकर ऊपर से निगल जायें, इसके बाद थोड़ी सी मधु चाट लें, इसके प्रयोग से रति शक्ति और स्तंम्भन शक्ति में बहुत वृद्धि होती हैं।

सिरदर्द में करेला रस के फायदे एवं सेवन विधि:

शिरःशूल (सिरदर्द) में करेला के 11-12 मिलीलीटर पत्र रस के साथ थोड़ा गाय का घी और पित्तपापडे का रस मिलाकर सिर पर लेप करने से, पैत्तिक शिरःशूल शीघ्र नष्ट हो जाता हैं।

नेत्ररोग में करेला जूस के फायदे एवं सेवन विधि:

नेत्ररोग में आंख का फूला, जाला और रतौंधी में जंग लगे हुये लोहे के बर्तन में करेला के पत्ते का रस और एक काली मिर्च का थोड़ा सा हिस्सा घिसकर अंजन करने से या आँख की कोटर या आंख की पपड़ियों के आसपास लगाने से आँख के सभी प्रकार के दोष दूर हो जाते है।

कान के रोग में करेला के ताजे फल के फायदे एवं सेवन विधि:

कर्णशूल में करेला के ताजे फल का अथवा पत्तों का रस गर्म कर कान में डालने से कान के सभी प्रकार के रोग में लाभ होता हैं।

मुंह के छाले में करेला जूस के फायदे एवं सेवन विधि:

मुँह के छाले में करेला के रस में चाक मिटटी मिलाकर मुंह के अंदर धारण करने से मुँह के छाले नष्ट हो जाते हैं।

वमन में करेला रस के फायदे एवं सेवन विधि:

वमन (उल्टी) पैत्तिक रोगों में पत्रस्वरस 10-12 ग्राम में थोड़ा सिरका या सैंधा नमक मिलाकर या करेला के रस में सुगंधित द्रव्यों का योग देकर पिलाने से वमन और विरेचन होकर रोग की शांत हो जाता हैं।

कंठ की सूजन में सूखे हुए करेला के फायदे एवं सेवन विधि:

कंठ की सूजन में सूखे हुए करेला को सिरके में पीसकर गर्म करके कंठ पर लेप करने से कंठ की सूजन बिखर जाती हैं।

प्रसूता स्त्री के दूध की वृद्धि में करेला पत्तों के फायदे एवं सेवन विधि:

प्रसूता स्त्री के दूध की वृद्धि में करेला के 25 ग्राम पत्तों को उबालकर प्रसूता महिला को पिलाने से प्रसूता स्त्री का दूध बढ़ता हैं और रुधिर शुद्ध होता हैं।

तिल्ली में करेला पत्तों के फायदे एवं सेवन विधि:

तिल्ली में करेला के 14-15 मिलीलीटर फल के रस या पत्तों के रस में राई और नमक मिलाकर पिलाने से तिल्ली में लाभ होता हैं।

जलोदर में करेला पत्तों के फायदे एवं सेवन विधि:

जलोदर (पेट में अधिक पानी का भरने) में करेला के पत्तों के 10-15 मिलीलीटर रस में शहद मिलाकर रोगी को पिलाने से जलोदर में लाभ होता हैं।

कामला रोग में करेला के फायदे एवं सेवन विधि:

कामला (पीलिया रोग) में करेला के पत्तों के 14-15 मिलीलीटर रस में बड़ी हरड़ को घिसकर पीलिया रोगी को पिलाने से पीलिया रोग में लाभ होता हैं।

शिशु उत्क्लेश में करेला जूस के फायदे एवं सेवन विधि:

शिशु उत्क्लेश में करेला के पत्र का स्वरस 6 ग्राम तक लेकर उसमें थोड़ा हरिद्रा चूर्ण मिलाकर शिशु उत्क्लेश रोगी को पिलाने से वमन होकर बालक का आमाशय शुद्ध होता हैं।

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आंत के कीड़े में करेला पत्तों के फायदे एवं सेवन विधि:

आंत्रकृमि में करेला के पत्तों का 10-12 ग्राम रस पिलाने से आँतों के कीड़े मरते हैं।

हैजा रोग में करेला जूस के फायदे एवं सेवन विधि:

विसूचिका रोगी में करेला जड़ के 50-110 मिलीलीटर काढ़ा में तिल तेल मिलाकर पिलाने से हैजा रोगी को लाभ होता हैं।

सन्धिवात में करेला के फायदे एवं सेवन विधि:

सन्धिवात में करेला फल के ऊपरी छिलके को निकाल कर शेष भाग को आग पर 10 मिनट रखकर भुर्ता बना लें, फिर इसमें खंड मिलाकर रोगी को गर्म-गर्म सुहाता हुआ खिला दे। इस प्रकार सुबह-शाम करीब 120 ग्राम तक यह भुर्ता खंड मिलाकर सन्धिवात रोगी को गर्म-गर्म सुहाता हुआ खिलाने से स्नायुगतवात, सन्धिवात आदि में लाभ होता हैं। पीड़ास्थान पर फलों के रस का बार-बार प्रलेप करते रहने से सन्धिवात में लाभदायक है।

वातरक्त रोग में करेला के फायदे एवं सेवन विधि:

वातरक्त रोग में करेला फल के ऊपरी मोटे चिकने भाग का कल्क और काढ़ा द्वारा सिद्ध किये गये घी का सेवन करने से वातरक्त रोग में लाभ होता हैं।

चर्मरोग में करेला के फायदे एवं सेवन विधि:

चर्मरोग में करेला के पंचांग, दालचीनी, पीपर और चावलों को जंगली बादाम के तेल में मिलाकर त्वचा पर लेप करने खुजली चर्मरोग, त्वचा के रोग नष्ट हो जाते हैं। करेला के पत्तों का रस सिर पर लेप करने से पीप वाली फुंसियां मिटती हैं। इसकी जड़ का उबटन महीन फुंसियों पर गुणकारी हैं।

दाह में करेला पत्तों के फायदे एवं सेवन विधि:

दाह में पैर के तलुवों की दाह पर करेला के पत्तों के रस का लेप करने से दाह शांत होती हैं।

सिर की फुंसी में करेला जूस के फायदे एवं सेवन विधि:

सिर की फुंसी में करेला के स्वरस में चावलों को जंगली बादाम के तेल व पीपर में मिलाकर गंजे सिर पर लेप करने से सिर की फुंसियां नष्ट हो जाती है।

दाद में करेला पत्तों के फायदे एवं सेवन विधि:

दाद रोग में करेला के पत्तों का रस दाद पर लगाने से दाद जड़ से नष्ट हो जाती है।

चेचक रोग में करेला रस के फायदे एवं सेवन विधि:

विस्फोटक रोग में करेला के पत्तों का 10-15 मिलीलीटर ताजा रस थोड़ी हल्दी मिलाकर दिन में दो तीन बार पिलाने से चेचक, खसरा और अन्य विस्फोटक रोगों में लाभ होता हैं।

खसरा रोग में करेला पत्तों के फायदे एवं सेवन विधि:

खसरा रोगी को करेला के पत्तों का 14-15 मिलीलीटर ताजा स्वरस में हल्दी को मिलाकर सुबह-शाम तथा दोपहर प्रयोग करने से खसरा रोगी को आराम मिलता है।

शीतज्वर में करेला जूस के फायदे एवं सेवन विधि:

शीतज्वर में ठंड लगने से पहिले करेला के 10-15 मिलीलीटर रस में जीरे का चूर्ण मिलाकर सुबह-शाम तथा दोपहर सेवन करने से शीतज्वर में लाभ होता है।

बच्चों के रोग में करेला पत्तों के फायदे एवं सेवन विधि:

नवजात शिशु के मुख में करेला के पत्ते का टुकड़ा रखने से उसकी छाती और अंतड़ियों का सब मल और आम निकल जाता हैं। तथा नवजात शिशु को आराम मिलता है।

बालकों के निमोनियाँ में करेला जूस के फायदे एवं सेवन विधि:

बाल निमोनियाँ में करेला के पत्र का स्वरस 10-12 मिलीलीटर को गुनगुना कर उसमें थोड़ी असली तथा केशर मिलाकर सुबह-शाम तथा दोपहर पिलाने से बालकों के निमोनियाँ रोग में लाभ होता हैं।

सूजन में करेला पत्तों के फायदे एवं सेवन विधि:

सूजन में करेला पौधे के पत्तों को सिरके में मिलाकर गर्म करके सूजे हुए स्थान पर लेप करने से सूजन बिखर जाती है तथा दर्द में भी शीघ्र आराम मिलता है।

रतौंधी में करेला जूस के फायदे एवं सेवन विधि:

रतौंधी में जंग लगे हुये लोहे के बर्तन में करेला के पत्तों के स्वरस में काली मिर्च का थोड़ा सा हिस्सा घिसकर आँख के आसपास लेप करने से या आँख की कोटर या आंख की पपड़ियों के पास लेप करने से रतौंधी रोग में लाभ होता है।

मस्तक पीड़ा में करेला के फायदे एवं सेवन विधि:

मस्तक पीड़ा में करेला के 10-12 मिलीलीटर पत्र के स्वरस के साथ गाय का घी और पित्तपापडे का रस मिलाकर मस्तक पर लेप करने से मस्तक पीड़ा में शीघ्र आराम मिलता हैं।

त्वचा की सुंदरता में करेला रस के फायदे एवं सेवन विधि:

त्वचा को स्वाफ्ट रखने में करेला के स्वरस में दालचीनी और पीपर के साथ चावलों को जंगली बादाम के तेल में मिलाकर त्वचा पर लेप करने से त्वचा निखर जाती है।

खुजली में करेला पत्तों के फायदे एवं सेवन विधि:

खुजली में करेला के पत्तों के स्वरस में जंगली बादाम के तेल और पीपर को बराबर मात्रा में मिलाकर शरीर पर लेप करने से खुजली नष्ट हो जाती है।

फोड़ा-फुंसी में करेला रस के फायदे एवं सेवन विधि:

फोड़ा-फुंसी में करेला के स्वरस में पीपर, दालचीनी, चावल को सम्भाग मिलाकर लगाने से फोड़ा-फुंसी में लाभ होता है।

मोटापा में करेला रस के फायदे एवं सेवन विधि:

मोटापा में आधा कप करेले का जूस पानी में बराबर मात्रा में मिलाकर उसमें एक नींबू निचोड़कर प्रातःकाल खाली पेट प्रयोग करने से मोटापा कम होता है।

कब्ज में करेला जूस के फायदे एवं सेवन विधि:

कब्ज में एक-दो करेले के जूस में आवंला के चूर्ण को आधा कप पानी में मिलाकर सुबह-शाम तथा दोपहर सेवन करने से कब्ज नष्ट हो जाती है।

करेला पौधे का परिचय

करेला के गुणों से सब परिचित हैं। मधुमेह के रोगी विशेषतः करेला के रस और तरकारी का सेवन करते हैं।

करेला वृक्ष के बाह्य-स्वरूप

प्रायः सब प्रांतों में इसका रोपण करते हैं। इसकी लता मृदु रोमश होती हैं। पत्ते 1 से 4.5 इंच के घेरे में गोलाकार, गहरे कटे किनारे वाले एवं 6 से 7 भागों में विभक्त रहते हैं। फूल चमकीले पीले रंग के होते हैं। फल 1 से 5 इंच लम्बे बीच में मोटे तथा दोनों तरफ नुकीले, त्रिकोणाकृति उभारों के कारण उवद-कावड़ परन्तु पकने पर पीले रंग के हो जाते हैं।

करेला के औषधीय गुण-धर्म

करेला, कड़वा, वातकारक, दीपन, भेदन, तिक्त, शीतल, वृष्य, हल्का, पित्तकारक, कफ पाण्डु, व्रणकृमि, श्वास-कास, प्रमेह, कुष्ठ तथा ज्वरनाशक हैं। भाव प्रकाश के अनुसार करेला शीतल, मलभेदक, दस्तावर, हल्का कड़वा और वातकारक हैं। यह ज्वर, पित्त-कफ-रक्तविकार, पांडुरोग, प्रमेह और कृमिनाशक हैं।

करेला के अधिक सेवन करने से नुकसान

अधिक मात्रा में करेला रुक्षता कारक हैं। अतः अतियोग से उपद्रव होने पर चावल और घी खिलना चाहिये।

करेला का अधिक प्रयोग करने से उल्टी की समस्या बढ़ जाती है, क्योंकि करेला बहुत तीखा होता है इसे सब लोग हजम नहीं कर पाते।

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