चमेली के फायदे, गुण, नुकसान और औषधीय गुण

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चमेली अनेक रोगों की दवा जैसे:- बुखार, मासिक धर्म, नपुंसकता, सफ़ेद दाग, लकवा, चर्मरोग, पेट के कीड़े, सिरदर्द, कर्णरोग, पाचन शक्ति, मुखपाक, उपदंश. पेट की गैस, नेत्र रोग, पैर की बवाय, दाह, घाव आदि बिमारियों के इलाज में चमेली के औषधीय चिकित्सा प्रयोग निम्नलिखित प्रकार से किये जाते है:चमेली के फायदे, गुण, नुकसान और औषधीय प्रयोग

Table of Contents

चमेली वृक्ष में पाये जाने वाले पोषक तत्व

चमेली के पत्रों में जैस्मिनाइन नामक एक उपक्षार तथा रेजिन पाया जाता हैं। चमेली के तेल में बेन्जिल ऐसीटेट, मेथिल ऐथर निलेट और आईलिकूल नामक पदार्थ पाये जाते हैं।

आयुर्वेदिक औषधिजड़ी-बूटी इलाज

बुखार में चमेली के फायदे एवं सेवन विधि:

बुखार में चमेली की पत्तियां, नागरमोथा, आंवला, यवासा समभाग तैयार काढ़ा में गुड़ मिलाकर दिन में दो बार 30 मिलीलीटर मात्रा में सेवन करने से बुखार के रोगी के अंदर प्रवेश हुये दोष शीघ्र बाहर निकल जाते हैं। तथा बुखार के मरीज को शीघ्र आराम मिलता है:-बुखार में गिलोय के फायदे एवं सेवन विधि:CLICK HERE

मासिक धर्म में चमेली के फायदे एवं सेवन विधि:

मासिक धर्म में चमेली के 20 ग्राम पंचांग को आधा किलो पानी में पकाकर चतुर्थाश शेष काढ़ा सुबह-शाम पिलाने से तिल्ली आदि अंगों के बहाव की रुकावट और मासिक धर्म की रुकावट नष्ट हो जाती है।

नपुंसकता में चमेली के फायदे एवं सेवन विधि:

नपुंसकता में चमेली के पुष्प व पत्रस्वरस से सिद्ध तेल की मालिश या जड़ का लेप इंद्री पर करने से ध्वज भंग और नपुंसकता में लाभ होता है। चमेली के पत्रस्वरस से सिद्ध 10 मिलीलीटर तेल में 2 ग्राम राई को पीसकर मूत्रेन्द्रिय, बस्ति, और जाँघों पर लेप करने से नपुंसकता मिटती हैं। यह लेप बहुत उग्र हैं। इसलिए इसका प्रयोग सावधानीपूर्वक करना चाहिए। इसके 5-10 फूल पीसकर कामेन्द्रियों पर लेप करने से स्तम्भन की शक्ति बढ़ती हैं।

सफ़ेद दाग में चमेली के फायदे एवं सेवन विधि:

कोढ़ (सफ़ेद दाग) में चमेली की नई पत्तियां, इंद्र जौकूट, सफेद कनेर की जड़ करंज के फल, दारू हल्दी की छाल सब को एक साथ मिलाकर लेप करने से सफ़ेद दाग नष्ट हो जाता है। चमेली की जड़ के काढ़ा का सेवन करने से कुष्ठ रोग में लाभ होता हैं।

लकवा में चमेली के फायदे एवं सेवन विधि:

अर्दित (लकवा) में चमेली की जड़ को पीसकर लेप करने तथा तेल की मालिश करने से लकवा में लाभ होता है।

त्वचा में चमेली के फायदे एवं सेवन विधि:

त्वचा में चमेली के 10-20 फूलों को पीसकर चेहरे पर लेप करने से चेहरे पर निखार आता हैं।

चर्म रोग में चमेली के फायदे एवं सेवन विधि:

चर्मरोग में चमेली का तेल चर्मरोगों की एक अचूक दवा हैं। चमेली की जड़ को पीसकर लेप करने से सभी प्रकार के जहरीले घावं, खाज, खुजली, अग्नि दाह, मर्मस्थान के नहीं भरने वाले घाव आदि रोग शीघ्र ठीक हो जाते है। चर्म रोग तथा रक्त विकार जन्य रोगों में चमेली के 8-10 फूलों को पीसकर लेप करने से आराम मिलता हैं।

पेट के कीड़े में चमेली के फायदे एवं सेवन विधि:

उदरकृमि (पेट के कीड़े) में चमेली के 10 ग्राम पत्तों को पानी में थोड़ा जोश देकर पीने से पेट के कीड़े निकल जाते हैं। मासिक धर्म साफ़ भी होता हैं।

सिरदर्द में चमेली के फायदे एवं सेवन विधि:

सिरदर्द में चमेली के तीनों पत्रों को गुल रोगन के साथ पीसकर 2-2 बूँद नाक में टपकाने से मस्तक का दर्द उत्तर जाता है।

कर्णरोग में चमेली के फायदे एवं सेवन विधि:

कर्णरोग में कान में यदि दर्द हो पीब निकलती हो, तब चमेली के 20 ग्राम पत्रों को 100 ग्राम तिल के तेल में उबालकर तेल को कान में 1-1 बूँद डालने से पीब निकलना बंद हो जाता हैं। चमेली के तेल में एलबा मिला के कान में डालने से कान की खुजली मिटती हैं। चमेली के पत्रों का 5 मिलीलीटर रस 10 मिली गौमूत्र में मिलाकर गर्मकर कान में डालने से कान का दर्द मिटता हैं।

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पाचन शक्ति में चमेली के फायदे एवं सेवन विधि:

पाचन शक्ति में चमेली की जड़ का काढ़ा 10-20 ग्राम की मात्रा में नियमित रूप से सेवन करने से पाचन शक्ति ठीक रहती है:पाचन शक्ति में तुलसी के फायदे एवं सेवन विधि:CLICK HERE

मुखपाक में चमेली के फायदे एवं सेवन विधि:

मुखरोग में चमेली के 25 से 50 ग्राम पत्रों का काढ़ा बनाकर गण्डूष करने से मुँह के छाले व मसूड़ों के रोगों में लाभ होता हैं। चमेली के पत्तों को चबाने से मुँह के छालों में तथा मसूड़ों के दोष में लाभ होता है।

उपदंश में चमेली के फायदे एवं सेवन विधि:

उपदंश में चमेली के पत्रों का स्वरस 20 ग्राम राल का चूर्ण 125 लिलिग्राम दोनों को मिलाकर प्रतिदिन प्रातः काल पीने से 15-20 दिन में गर्मी का रोग नष्ट हो जाता हैं। परहेज में सिर्फ गेंहू की रोटी, दूध, भात और घी चीनी का ही प्रयोग करना चाहिये।

पेट की गैस में चमेली के फायदे एवं सेवन विधि:

वायुशूल में चमेली के गर्म तेल में रुई का फोहा भिगो के नाभि पर रखने से पेट की गैस में आराम मिलता है।

नेत्र रोग में चमेली के फायदे एवं सेवन विधि:

आँख की फूली में चमेली के फूलों की 5-6 सफेद कोमल पंखुड़ियों को थोड़ी सी मिश्री के साथ खरल करके, आँख की फूली पर लेप करने से कुछ दिनों में वह फूली कट जाती है:-नेत्र रोग में गिलोय के फायदे एवं सेवन विधि:CLICK HERE

पैर की बवाय में चमेली के फायदे एवं सेवन विधि:

बिवाई में चमेली के पत्तों के ताजा रस को पैरों की बवाय पर लगाने से बवाय ठीक हो जाता हैं।

दाह में चमेली के फायदे एवं सेवन विधि:

दाह में चमेली के फूलों से निर्मित सुगंधित तेल दाह को ऐसे शांत करती हैं। जैसे जल अग्नि को।

घाव में चमेली के फायदे एवं सेवन विधि:

घाव-व्रणों शोधन एवं रोपण के लिये, चमेली के पत्रों के काढ़ा से घावों को धोना, एवं पत्रों कण एवं पत्रों से सिद्ध तेल को लगाने घाव में लाभदायक हैं।

चमेली वृक्ष का परिचय

चमेली की बेल पूरे भारतवर्ष में घरों में, वाटिकाओं में गमलों में, मंदिरों में, सौंदर्य बढ़ाने के लिए लगाई जाती हैं। इसके पुष्पों से इत्र और तेल बनाया जाता हैं। चमेली का एक पौधा आठ से पंद्रह वर्षो तक फूल देता हैं। इसके फूलों की गंध इतनी प्रिय और मनोहारिणी होती है कि अवसादित निराश हृदय में नवीन चेतना व स्पदंन का संचार कर देती हैं। इसीलिये इसे सुमना, हृदय, गंध चेतिका इत्यादि नाम दिये गये हैं। पुष्प भेद में इसकी दो जातियां पाई जाती है। जो निम्न प्रकार हैं।
1. इसे स्वर्ण जाती कहते हैं लैटिन में इसका नाम Jasmine bumile है। चमेली के पुष्प पीले और सुंगधित होते हैं।
2. Jasmine grandiflorum सफ़ेद पुष्प वाली चमेली का वर्णन यहां किया गया है।

चमेली पौधे के बाह्य-स्वरूप

चमेली गुल्मं लता के रूप में होता हैं। शाखाएं धारीयुक्त, पत्र अभिमुख असंपक्ष्वत। पत्रक 6-11 तथा शीर्ष पत्रक सबसे बड़ा होता हैं। पुष्प वृन्त अक्षीय या अंत्यु पत्रों से बड़े होते हैं। पुष्प वृन्तों पर श्वेत सुगंधित पुष्प खिले रहते हैं वर्षाकाल में इस पर पुष्प खिलते हैं।

चमेली वृक्ष के औषधीय गुण-धर्म

चमेली कफ पित्तशामक, वातशामक, त्रिदोषहर व्रणरोपण, व्रणशोधन, वणर्य, बाजीकरण ओर वेदना स्थापन हैं तेल वातशामक और सौमनस्यजनन हैं।
पत्र :- मुखरोग नाशक, कुष्ठ्घ्न, कण्डुघ्न तथा दांतो के लिये हितकारी है।

चमेली के नुकसान

चमेली के अधिक सेवन से गर्म प्रकृति वालों के सिर में दर्द होता हैं। इसके दर्द का नाश करने के लिये, गुलाब का तेल और कपूर का प्रयोग करना चाहियें।

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