भांगरा (भृंगराज) के फायदे, गुण, नुकसान और औषधीय गुण

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भांगरा की दवा:- बुखार, खांसी, बवासीर, योनि रोग, गर्भरक्षा कवच, अंडकोष की सूजन, लम्बी आयु, प्रमेह, गंजापन, अधकपारी, नेत्र रोग, दांत की पीड़ा, रक्त चाप, पीलिया, पेट दर्द, दस्त, हैजा, भगंदर, खुजली, चकर आना, दाह, एलर्जी, जुखाम, हांथी पाँव, बिच्छू विष, मुखपाक, गण्डमाला, डिप्थीरिया, उपदंश, गुदाभ्रंश आदि बिमारियों में भांगरा के औषधीय चिकित्सा प्रयोग निम्नलिखित प्रकार से किये जाते है:-भांगरा के फायदे, गुण, नुकसान और औषधीय प्रयोग

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भांगरा में पाये जाने वाले पोषक तत्व

भांगरा के पोषक तत्व वेडेलोलैक्टोन, लुटेओलिन, एपिजेनिन, ट्रीटरपेनोइड्स, एक्लालबाटिन, अल्फा-अमीरिन, ओलीनोलिक एसिड, उर्सोलिक एसिड, फ्लवोनोइड्स, एपिजेनिन और लुटेओलीन, वेडेलोलैक्टोन, एचिनोसिस्टिक, एसिड, ग्लाइकोसाइड्स, सीटोस्टेरॉल, डोकोस्टेरॉल आदि पोषक तत्व पाये जाते है।

आयुर्वेदिक औषधिजड़ी-बूटी इलाज

बुखार में भांगरा की दवाएं एवं सेवन विधि:

टायफाइड बुखार में भांगरा के स्वरस को 2-2 चम्मच सुबह-शाम-दोपहर सेवन करने से टायफाइड बुखार में लाभदायक होता हैं।

खांसी में भांगरा की दवाएं एवं सेवन विधि:

बलगम खांसी में तिल्ली बढ़ी हुई हो, लीवर ठीक न हो, भूख बंद हो, कफ व खासी भी हो, ज्वर बना रहे तब भांगरे का 4 से 6 ग्राम स्वरस 30 ग्राम, दूध में मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से खांसी में लाभदायक होता हैं।

बवासीर में भांगरा की दवाएं एवं सेवन विधि:

बवासीर में भांगरा के पत्र 50 ग्राम और काली मिर्च 5 ग्राम दोनों को खूब महीन पीसकर छोटे बेर जैसी गोलियां बनाकर छाया शुष्क कर रखें। सुबह-शाम 1 या 2 गोली जल के साथ सुबह-शाम-दोपहर सेवन करने से बवासीर में शीघ्र लाभ होता हैं। बवासीर के पत्र 3 ग्राम व काली मिर्च 5 नग दोनों का महीन चूर्ण ताजे जल से सुबह-शाम सेवन करने से एक सप्ताह में बवासीर में लाभ होता हैं।

योनि रोग में भांगरा की दवाएं एवं सेवन विधि:

योनि रोग में प्रसव के पश्चात होने वाले योनि शूल में भांगरा का पंचांग तथा बेल दोनों की जड़ के बारीक चूर्ण को समान मात्रा में लेकर शहद मिलाकर बराबर मात्रा में सेवन करने से योनि रोग शीघ्र नष्ट हो जाती हैं।

गर्भरक्षा में भांगरा की दवाएं एवं सेवन विधि:

गर्भरक्षा (कवच) में भांगरा के 4 ग्राम स्वरस में समान मात्रा में गौदुग्ध मिलाकर नियमित प्रातः पिलाते रहने से अकाल में गर्भपात नहीं होने पाता। गर्भ पुष्ट होकर गर्भ व गर्भिणी के रक्त की शुद्धि होती हैं। योनिमार्ग या मूत्र मार्ग से रक्तस्राव की शिकायत में, भांगरा के पत्रों का चतुर्थाश काढ़ा सिद्ध कर 20 से 50 ग्राम तक सुबह-शाम सेवन करने से लाभ होता हैं।

अंडकोष की सूजन में भांगरा की दवाएं एवं सेवन विधि:

अंडकोष वृद्धि -अंडकोष की सूजन में भांगरा के पंचांग को पीस टिकिया बनाकर अंडकोष पर बांधने से अंडकोष की सूजन बिखर जाती हैं।

लम्बी आयु में भांगरा की दवाएं एवं सेवन विधि:

दीर्घायु लम्बी आयु में ताजे भांगरा को पीसकर उसका निकाला हुआ स्वरस सुबह-शाम 10 मिलीलीटर की मात्रा में पीने से और पथ्य में सिर्फ दूध पर ही रहने से 1 महीने में शरीर निरोग हो जाता हैं। तथा बल और क्रान्ति बढ़ती हैं तथा मनुष्य दीर्घायु हो जाता हैं। भांगरा के 15 ग्राम पत्रों के चूर्ण को प्रतिदिन घी, मधु और खंड मिलाकर 1 वर्ष तक सेवन करने से बल वीर्य की वृद्धि होती है तथा बुद्धि व स्मरण शक्ति भी बढ़ जाती है।

प्रमेह में भांगरा की दवाएं एवं सेवन विधि:

प्रमेह में भांगरा के 1 भाग रस, तुलसी पत्र, श्वेत सेम के पत्र और पटोल पत्र 1-1 भाग का चूर्ण मिलाकर तथा कांजी में पीसकर लेप करने से प्रमेह नष्ट होती हैं।

गंजापन में भांगरा की दवाएं एवं सेवन विधि:

गंजापन में बालों को छोटा करके उस स्थान पर जहां पर बाल न हों, भांगरा के पत्र स्वरस की मालिश करने से कुछ दिनों में अच्छे काले बाल निकलते हैं, जिनके बाल टूटते हैं, या दो मुंहे हो जाते हों उन्हें इस प्रयोग को अवश्य करना चाहिए। त्रिफला के चूर्ण को भांगरा के रस की 3 भावनायें देकर अच्छी तरह सुखाकर खरल कर रखें। नित्य प्रतिदिन प्रातः डेढ़ ग्राम सेवन करने से बालों को सफेद होने से रोकता है नेत्र ज्योति को भी बढ़ता हैं।

अधकपारी में भांगरा की दवाएं एवं सेवन विधि:

आधाशीशी (अधकपारी) में भांगरा के रस और बकरी का दूध समान भाग लेकर उसको गर्म करके नाक में टपकाने से और भांगरा के स्वरस में काली मिर्च का चूर्ण मिलाकर लेप करने से अधकपारी नष्ट हो जाती है।

नेत्र रोग में भांगरा की दवाएं एवं सेवन विधि:

नेत्र रोग में भांगरा छाया शुष्क पत्तों का महीन चूर्ण 10 ग्राम, मधु 3 ग्राम, का घी 3 ग्राम, नित्य रात्रि में 40 दिन तक सेकं से दृष्टिमान्ध आदि सभी प्रकार के नेत्र रोगों में लाभ होता है। भांगरा का स्वरस 2 बूँद सूर्योदय से 1 घंटे के अंदर या सूर्यास्त से 1 घंटे पूर्व आँखों में डालते रहने से फूली आदि नेत्र रोग शीघ्र अच्छे हो जाते है।

दांत पीड़ा में भांगरा की दवाएं एवं सेवन विधि:

दांत पीड़ा में रोगी की जिस ओर की दाढ़ में दर्द हो उससे विपरीत, कान के भीतर भांगरा के स्वरस की 2-4 बूंदे टपकाने से दर्द शीघ्र दूर होता हैं। एक बार में लाभ न हो तो दोबारा प्रयोग करने से अवश्य लाभ होता है।

रक्त चाप में भांगरा की दवाएं एवं सेवन विधि:

रक्त चाप में भांगरा के पत्तों का रस 2 चम्मच मधु 1 चम्मच दिन में दो बार सेवन करने से उच्च रक्तचाप कुछ ही दिनों में सामान्य हो जाता हैं। यदि पैर में कब्जी न हो तो यह सामान्य रहता हैं। भांगरा से पेट भी ठीक रहता है तथा भूख भी बढ़ती है।

पीलिया में भांगरा की दवाएं एवं सेवन विधि:

पीलिया में भांगरा पौधे को जड़ सहित छाया में शुष्क कर चूर्ण कर उसमें बराबर की मात्रा में त्रिफला चूर्ण मिला लें। तत्पश्चात मिश्रण के बराबर मिश्री मिलाकर इस मिश्रण में 20 ग्राम मात्रा में मधु या पानी के साथ दिन में तीन बार सेवन करने से मंदाग्नि और पीलिया रोग नष्ट हो जाता है।

पेट दर्द में भांगरा की दवाएं एवं सेवन विधि:

पेट दर्द में भांगरा के 10 ग्राम पत्रों के साथ 3 ग्राम काला नमक थोड़े जल में पीस छानकर सुबह-शाम-दोपहर सेवन करने से पेट का अधिक से अधिक दर्द दूर हो जाता हैं।

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दस्त में भांगरा की दवाएं एवं सेवन विधि:

अतिसार-आम अतिसार एवं रक्त अतिसार में भृंगराज की जड़ का महीन चूर्ण की करके बराबर मात्रा में बेल का चूर्ण मिलाकर सुबह शाम 1-1 चम्मच ताजे पानी के साथ दिन में तीन बार सेवन करने से दस्त व खुनी दस्त दोनों प्रकार के दस्त में लाभप्रद होता हैं:दस्त में गाजर के फायदे एवं सेवन विधि:CLICK HERE

हैजा में भांगरा की दवाएं एवं सेवन विधि:

विसूचिका (हैजा) में भांगरा के पंचांग 2 चम्मच स्वरस में सेंधा नमक मिलाकर सुबह, दोपहर तथा शाम सेवन करने से हैजा में लाभ होता है।

भगंदर में भांगरा की दवाएं एवं सेवन विधि:

भगंदर में भांगरा को पुल्टिस जैसा बनाकर बांधते रहने से कुछ ही दिनों में भगंदर शुद्ध होकर भर जाता है।

खुजली में भांगरा की दवाएं एवं सेवन विधि:

खुजली में भांगरा के पत्ते 10 ग्राम, चिरायता 60 ग्राम, जवासा 10 ग्राम, शरपुन्खा 60 ग्राम, इन सबको 100 ग्राम पानी में पीस छानकर, 20 ग्राम मधु मिलाकर प्रतिदिन 1 सप्ताह तक सुबह, दोपहर तथा शाम सेवन करने से, शरीर निरोग होकर खुजली का नामोनिशान मिट जाता है।

कमजोरी में भांगरा की दवाएं एवं सेवन विधि:

कमजोरी में चक्कर आना भांगरा का स्वरस 4 ग्राम, खंड 3 ग्राम दोनों को मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से कुछ ही दिनों में मनुष्य की दुर्बलता दूर होकर चक्कर आने बंद हो जाते हैं।

दाह  में भांगरा की दवाएं एवं सेवन विधि:

दाह में हाथ पैर की जलन व शरीर की खुजली में और सूजन पर भांगरा के स्वरस की मालिश करने से दाह में शीघ्र लाभ होता है।

एलर्जी में भांगरा की दवाएं एवं सेवन विधि:

एलर्जी में भांगरा के पत्तों को मेहँदी और मरवा के पत्तों के साथ पीसकर लेप करने से शीघ्र ही लाभ होता हैं तथा नवीन त्वचा शरीर के वर्ण की ही होती हैं। ठीक होने लगे तब भांगरा के पत्तों का रस 2 भाग, काली तुलसी पत्र रस 1 भाग, दिन में 2-3 बार लगाते रहने से जलन शांत हो जाती है और शरीर पर किसी किसी प्रकार का दाग नहीं पड़ने देता।

जुखाम में भांगरा की दवाएं एवं सेवन विधि:

जुखाम में भांगरा का स्वरस 250 ग्राम, तिल का तेल 250 ग्राम, सेंधा नमक 10 ग्राम, तीनो को मिलाकर धीमी आग पर पकाकर तेल सिद्ध कर लें। इस तेल की लगभग 10 बूँद तक नाक के दोनों नथुनों में टपकाने से अंदर कफ तथा कृमि बाहर निकलकर थोड़े ही दिनों में जुखाम नष्ट हो जाता है। जुखाम में गेंहू की रोटी व मूँग की दाल का सेवन करें।

हांथी पाँव में भांगरा की दवाएं एवं सेवन विधि:

श्लीपद (हांथी पाँव) भांगरा के पंचांग की लुगदी को तिल के तेल में मिलाकर अथवा केवल भांगरे के स्वरस से हांथी पाँव में मालिश करने से अत्यंत लाभ होता है।

बिच्छू विष में भांगरा की दवाएं एवं सेवन विधि:

बिच्छू के विष में या बिच्छू दंश में भांगरा के पत्तों को पीसकर सूजे हुए स्थान पर मसलने से, दर्द डंक स्थान पर इकट्ठी हो जाती हैं। डंक स्थान पर अच्छी तरह से मसलकर पत्तों की लुगदी बाँध देने से बिच्छू विष उत्तर जाता है।

मुखपाक में भांगरा की दवाएं एवं सेवन विधि:

मुखपाक में भांगरा के 5 ग्राम पत्तों को मुख में रखकर चबायें तथा लार थूकते रहने, दिन में दो तीन बार प्रयोग करने से मुखपाक में शीघ्र लाभ होता है।

कंठमाला में भांगरा की दवाएं एवं सेवन विधि:

कंठमाला में भांगरा के पत्तों को पीसकर टिकिया बनाकर घी में पकाकर कण्ठमाल की गांठों पर बाँधने से शीघ्र लाभ होता हैं।

डिप्थीरिया में भांगरा की दवाएं एवं सेवन विधि:

डिप्थीरिया में भांगरा के 10 ग्राम स्वरस में समभाग गाय का घी, चौथाई असली यवक्षार मिलाकर पकायें, जब खूब खौल जाये तब दो-दो घंटे के बाद पिलाने से डिप्थीरिया शांत हो जाती हैं।

उपदंश में भांगरा की दवाएं एवं सेवन विधि:

उपदंश में भांगरा के स्वरस में अथवा भांगरा और चमेली के पत्तों के रस के मिश्रण से उपदंश के व्रण को धोने से उपदंश में शीघ्र लाभ होता है। इसी रस का लेप करने से उपदंश नष्ट हो जाता है। भांगरा का चूर्ण 3 भाग, काली मिर्च चूर्ण 1 भाग, दोनों को एकत्र कर भांगरे के ही स्वरस से खरल कर 1-1 ग्राम की गोलियां बनाकर सुबह-शाम 1-2 गोली सेवन करने से उदर रोग, नेत्र रोग व भगंदर तथा उपदंश में अत्यंत लाभप्रद होता है।

गुदाभ्रंश में भांगरा की दवाएं एवं सेवन विधि:

गुदभ्रंश में भांगरा की जड़ और हल्दी के चूर्ण को पीसकर लेप करने से गुदभ्रंश में लाभ होता हैं।

भांगरा का परिचय

घने मुलायम काले कुंतल देशों के लिए प्रसिद्ध भांगरा के स्वयंजात क्षुप 6,000 फुट की ऊंचाई तक आर्द्रभूमि में जलाशयों के समीप बारह मॉस उगते हैं। इसकी एक और प्रजाति पीट भृंगराज Cbinensis पाई जाती है, जिसके पौधे बंगाल, कोंकण और मद्रास में अधिक पाये जाते हैं।

भांगरा पौधे के बाह्य-स्वरूप

भांगरा के छोटे-छोटे एक वर्षायु क्षुप, प्रसरणशील तथा कभी-कभी खड़े अनेक शाखीय, शाखाएं रोमावृत्त और ग्रंथियों पर मूलयुक्त होती है। पत्र अभिमुख प्रायः अवृंत या वृन्त बहुत छोटे, आयताकर, मालाकार या अंडाकार नुकीले होते हैं। श्वेत पुष्प मुण्डकों में लगते हैं। इसमें सामान्यतः जाड़ों में पुष्प व फल लगते है। बीज लम्बे, छोटे, काली जीर्ण के समान होते हैं। इसकी पत्तियों को मसलने पर एक हरित कृष्णाभ रस निकलता है जो शीघ्र ही काला पड़ जाता हैं।

भांगरा के वृक्ष रासायनिक संघटन

भांगरा में एक्लिप्टिन नामक एल्कोलाइड तथा विपुल मात्रा में राल पाया जाता हैं।

भांगरा पेड़ के औषधीय गुण-धर्म

भांगरा कफ वात शामक, वेदनास्थापन, नेत्र हितकारी, दीपन, पाचन, यकृत को उत्तेजित करने वाला, रक्त प्रसादं, रक्तवर्धक, शोथहर कुष्ठघ्न, कृमिघ्न, किषध्न, रक्तचाप, कम करने वाला, शरीर को बल देने वाला, ओज और कांति को बढ़ाने वाला, बल्य व रसायन हैं। बालों के लिये यह विशेष हितकारी है।

भांगरा के नुकसान 

भृंगराज का सेवन गर्भवती स्त्रियों और स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं माना जाता इसलिए भृंगराज का प्रयोग करने से पहले एक किसी वैद से सलाह लेनी चाहिए।

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